क्या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है इलाज? आईटी घोटाले ने एमडीएम अस्पताल की डिजिटल व्यवस्था पर उठाए सवाल
जोधपुर के एमडीएम अस्पताल में पुराने कंप्यूटरों के इस्तेमाल का कथित घोटाला सामने आया है। जानें कैसे यह तकनीकी लापरवाही मरीजों की जान के लिए खतरा बन सकती है।
सरकारी अस्पतालों में भीड़ कोई नई बात नहीं। सुबह होते ही लंबी कतारें, परेशान परिजन, हाथ में फाइल लिए इंतजार करते मरीज — यही आम दृश्य है। लेकिन जोधपुर के एमडीएम अस्पताल में सामने आया कथित आईटी घोटाला इस दृश्य को और गंभीर बना देता है।
शिकायत के अनुसार नए कंप्यूटर और प्रिंटर खरीदने के लिए लाखों रुपये स्वीकृत हुए, लेकिन ज़मीन पर पुराने या निष्प्रयोज्य सिस्टम इस्तेमाल किए गए। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि एक ऐसा सवाल है जो सीधे मरीज की जान से जुड़ता है।
अस्पताल में कंप्यूटर सिर्फ मशीन नहीं होते
आज अस्पतालों में कंप्यूटर सिर्फ टाइपिंग या बिलिंग के लिए नहीं हैं। वे पूरे इलाज की प्रक्रिया का आधार हैं:
• मरीज का पंजीकरण
• ओपीडी पर्ची
• लैब रिपोर्ट
• एक्स-रे और एमआरआई डेटा
• दवा वितरण
• इमरजेंसी केस रिकॉर्ड
जब सिस्टम धीमा पड़ता है, तो इलाज की पूरी रफ्तार थम जाती है। एक धीमा सिस्टम, कई जिंदगियों पर असर
कल्पना कीजिए :
सुबह 9 बजे एक बुजुर्ग मरीज सीने में दर्द लेकर अस्पताल पहुंचता है। पंजीकरण काउंटर पर सिस्टम बार-बार हैंग हो रहा है। लाइन बढ़ती जाती है। हर मिनट की देरी दिल के दौरे में जानलेवा हो सकती है।
इसी तरह, एक गर्भवती महिला को तत्काल जांच रिपोर्ट चाहिए। लेकिन यदि लैब सिस्टम अपडेट नहीं हो पा रहा, तो डॉक्टर निर्णय कैसे लें?
चिकित्सा विज्ञान में एक सिद्धांत स्पष्ट है उपचार में देरी, जोखिम में वृद्धि।
इमरजेंसी में तकनीकी चूक का खतरा
आपातकालीन वार्ड में हर सेकंड की कीमत होती है। सड़क दुर्घटना का शिकार युवक लाया गया है। तुरंत ब्लड ग्रुप मिलान, रिपोर्ट और ऑपरेशन की तैयारी जरूरी है। अगर सिस्टम धीमा हो या बंद पड़े, तो सर्जरी टल सकती है।
ऐसे में सवाल उठता है क्या तकनीकी लापरवाही जीवन के अधिकार पर सीधा आघात नहीं है?
दवा वितरण में डिजिटल गड़बड़ी
सरकारी अस्पतालों में दवा वितरण भी डिजिटल रिकॉर्ड से होता है। यदि डेटा एंट्री गलत हो जाए या रिकॉर्ड गायब हो जाए, तो मरीज को सही दवा समय पर नहीं मिलती। कई बीमारियों में एक दिन की दवा छूटना भी स्थिति को गंभीर बना सकता है।
क्या यह सिर्फ घोटाला है?
यदि कागजों में नए सिस्टम और जमीन पर पुराने उपकरण मिले, तो यह मामला सिर्फ आर्थिक गड़बड़ी नहीं रहेगा। यह विश्वास का संकट बन जाएगा।
सरकारी अस्पताल में आने वाला हर मरीज इस भरोसे के साथ आता है कि व्यवस्था उसकी जान बचाने के लिए है, न कि संसाधनों के दुरुपयोग के लिए।
जवाबदेही क्यों जरूरी है?
इस मामले में आवश्यक है:
• निष्पक्ष जांच
• तकनीकी ऑडिट
• खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता
• मरीजों पर प्रभाव का मूल्यांकन
• दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई
स्वास्थ्य व्यवस्था में लापरवाही का सीधा असर मानव जीवन पर पड़ता है।
एमडीएम अस्पताल का यह मामला हमें एक बड़े प्रश्न की ओर ले जाता है क्या हमारे सरकारी अस्पताल तकनीकी रूप से इतने सक्षम हैं कि वे हर मरीज को समय पर इलाज दे सकें?
यदि सिस्टम कागजों में नया और हकीकत में पुराना है, तो इसका मूल्य केवल पैसों में नहीं, बल्कि संभावित रूप से मानव जीवन में चुकाना पड़ सकता है।
यह सिर्फ एक घोटाले की कहानी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था में जवाबदेही की मांग है।